REALITY OF SHAHEEN BAG PROTEST

शाहीन बाग़ ही क्या पुरे मुल्क में और पुरे मुल्क में ही क्या बल्कि पूरी दुनिया में मुस्लिम महिलायें घर की चारदीवारी से निकल कर सड़कों पर अपनी नाराज़गी और ग़ुस्से का इज़हार कर रही हैं। हिंदुस्तान में देखा जाय तो शाहीन बाग़ ही नहीं बल्कि हज़ारों जगह औरतें ख़ासकर मुस्लिम औरतें PROTEST कर रहीं हैं। क्या इसकी असली वजह CAA और NRC ही है? इस पर बहुत संजीदगी से ग़ौर करने की ज़रूरत है। मुझे लगता है कि CAA और NRC मुस्लिम औरतों का घरों से निकल कर सड़कों पर आकर धरना देने और प्रदर्शन करने की फ़ौरी वजह हो सकती है लेकिन इसकी असली वजह कुछ और ही है। मुझे लगता है की इसकी असली वजह मुस्लिम औरतों पर लगाई गयी वह एकतरफ़ा पाबंदी है,शोषण और वह उत्पीड़न है जो सदियों से कभी मज़हब के नाम पर, कभी शरीयत के नाम पर,कभी परदे के नाम पर,कभी तलाक़ के नाम पर, कभी हलाला के नाम पर,कभी फ़तवे के नाम पर, कभी पहनावा के नाम पर किया जाता रहा है। अब इन औरतों को एक ख़ूबसूरत मौक़ा मिल गया है अपने अंदर भरी हुई नफ़रत और नाराज़गी के इज़हार करने का। पहले भी मुस्लिम औरतें अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रहीं हैं लेकिन शरीयत और मज़हब के नाम पर उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता था। अब ऐसा कोई नहीं कर रहा है। अब कोई नहीं कह रहा है कि औरतों का इस तरह से बे पर्दा होकर सड़क चौराहों और अन्य जगहों पर मर्दों के बीच बैठ कर धरना प्रदर्शन करना शरीयत के ख़िलाफ़ है। बे पर्दगी हो रही है। अब कोई फ़तवा जारी नहीं हो रहा है।
CAA और NRC का बहाना ना होता तो न जाने अब तक क्या क्या हो जाता। कैसे कैसे बयान दिए जाते। फ़तवा जारी हो चुका होता। शरीयत और मज़हब की ब्याख्या करने वालों की लाइन लग गयी होती। अब कोई नहीं बोल रहा रहा है। TV debates में यह बोलने वाले लोग की ” जब अल्लाह ने मुस्लिम मर्दों को अलग अलग बनाया है तो औरतें मर्दों की बराबरी क्यों कर रही हैं।” अब ऐसी सोच के लोग कहाँ है।
सवाल यह उठता है की मुस्तकबिल में जब औरतें अपने हकूक के लिए आवाज़ उठायेंगीं तो क्या तब भी शरीयत और मज़हब के ठेकेदार शरीयत के नाम पर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिस करेंगे,m
उनको घर की चारदीवारी में परदे के नाम पर क़ैद करने की कोशिस करेंगे। मुझे लगता है की ऐसे लोग अपनी हरकतों से तो बाज़ नहीं आयेंगे। कोशिस तो ज़रूर करेंगे, मुँह की खायेंगे। ऐसी सोच के लोगों को अब शाहीन बाग़ से सबक़ लेना चाहिये। औरतों की बेचैनी और दर्द को समझना चाहिए। भविष्य में उनके साथ बराबरी का सलूक करना होगा। शरीयत का हवाला दे कर उनके साथ ग़ैर बराबरी का सलूक करना बंद करना होगा। इस मुद्दे पर बहुत संजीदगी के साथ ग़ौर व फ़िक्र करना होगा, वरना जो हो रहा है देख रहें हैं और जो होगा चुप चाप देखना पड़ेगा। ठेकेदारी का ज़माना अब धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है।

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