ORIGIN OF RELIGIONS

ORIGIN AND DEVELOPMENT OF RELIGION

“धर्म शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, -असत्य, अचार- विचार, नीति-अनीति की अचार संहिता है जिसकी उत्पत्ति इसके माध्यम से अति प्राचीन काल में मानव में भय उत्पन्न कर सभ्यता व संस्कृति के विकास में आए गतिरोध को समाप्त करने तथा समाज को नियंत्रित व गतिशील बनाए रखने के लिए की गयी थी।”

मानव सभ्यता व संस्कृति के विकास के अध्ययन से मालूम होता है की ज़माना-ए- क़दीम में (अति प्राचीन काल में) आबादी बढ़ने व भोजन की कमी होने की वजह से मानव जंगलों पहाड़ों गुफ़ाओं कंडराओ से निकल कर मैदानों में आकर जंगलो को साफ़ कर रहने के लिए घास पूस के छप्पर बनाने लगा, खाने पीने के लिए कृषि व पशुपालन करने लगा, हिफ़ाज़त के लिए बस्तियाँ बसा कर कबीलों में रहने लगा। इस समय शासन पुलिस क़ानून अदालत नहीं थी, जो कबीला ताक़तवर होता था वह दूसरे क़बीले व लोगों के खेतों, पशुओं, मकानों व सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा कर उन्हें खदेड़ देता था। फलस्वरूप लोग पुनः जंगलों पहाड़ों में भागने लगे। इससे मानव सभ्यता व संस्कृत के विकास में अवरोध उत्पन्न होने लगा। समाज में अराजकता उत्पन्न होनी लगी। इसी समय कुछ मनीषी व बुद्धि जीवी लोगों ने एक ऐसी ब्यवस्था तथा लोक- ब्यावहार की रचना की तथा प्रचार प्रसार किया जिसके द्वारा लोग स्वम नियंत्रित होकर ग़लत तथा अन्नयाय पूर्ण कार्यों जैसे किसी की सम्पत्ति, खेत, मकान, पशु पर क़ब्ज़ा करना, चोरी व बेमानी करना, बलात्कार करना, किसी को डराना धमकाना, मरना पीटना, हत्या करना, आदि ना करे। इस ब्यवस्था के अंतर्गत लोगों को भयभीत कर स्वयं को नियंत्रित करने के लिए पाप-पुण्य, स्वर्ग- नरक, शुभ- अशुभ, धर्म -अधर्म, नीति-अनीति, दंड-पुरस्कार, कर्म-फल, पुनर्जन्म, सत्य-असत्य, देवी-देवताओं तथा ईश्वर जैसी अदृश्य शक्तियों की कल्पना की गयी। समस्त प्राकृतिक गतिविघियों को ईश्वर द्वारा घटित कहकर दैवी घटना के रूप में प्रचारित किया गया । इन प्राकृतिक गतिविधियों जैसे पानी बरसना, बादलों का गरजना, बिजली का चमकना, बाढ़ आना, सूखा पड़ना, आँधी तूफ़ान बवंडर का आना, सूरज का निकलना, रात का होना, सूर्या व चंद्र ग्रहण लगना आदि का मूर्तिकरन किया गया। सभी घटनाओं को किसी ना किसी देवी- देवता से जोड़ दिया गया। इसी ब्यवस्था तथा लोक- ब्यवहार रूपी नैतिक अचार संहिता को बाद में धर्म कहा जाने लगा। समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता गया। हर धर्म के अलग अलग मानने वाले हो गये। अलग अलग व्याख्या की जाने लगी। सरल शब्दों में धर्म को परिभासित करते हुए कहा जा सकता है कि “ धर्म एक, अचार- विचार, नीति-अनीति, शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, सत्य-असत्य की अचार संहिता है जिसकी उत्पत्ति अति प्राचीन काल में मानव सभ्यता व संस्कृति के विकास में आए गतिरोध को समाप्त करने तथा सामाजिक ब्यवस्था को बनाए रखने के लिए की गयी थी”। इसकी उत्तपत्ति आज से लगभग 2600 से 4000 साल पहले 6th century BC से 20th century bc के आप पास हुई।
बिना पुलिस, क़ानून तथा अदालत के हज़ारों साल तक समाज को इसी के माध्यम से गतिशील व नियंत्रित किया जाता रहा है। आज भी लोग इसी व्यवस्था से स्वम नियंत्रित होकर अचार- ब्यवहार करते हैं। हम आज भी पाप-पुण्य, स्वर्ग- नरक, शुभ- अशुभ, ग़लत- सही से डर कर व प्रेरित होकर आचरण करते हैं। जितना हम मौजूदा क़ानून से नहीं डरते उससे ज़्यादा इन काल्पनिक धारणाओं से डरते हैं। आधुनिक और सभ्य समाज में इसे धर्म का नाम दे दिया गया। धीरे- धीरे इस पर कट्टरता धर्मांधता का आवरण चढ़ा दिया गया। समय के साथ- साथ इसके साथ बहुत सी कुरीतियाँ, अंधविश्वास, परम्परा, रीति-रिवाजों को जोड़ दिया गया। आज धर्म मानव जाति की हत्या, शोषण, अत्याचार डराने-धमकाने, नफ़रत फैलाने, समाज को बाँटने, एवं लड़ाने, भेद- भाव करने, ऊँच- नींच, छूवाछूट फैलाने, का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। वर्तमान दुनिया का सभ्य मानव धर्म का इस्तेमाल सामाजिक ब्यवस्था को बनाए रखने के स्थान पर मानव जाति के संहार के लिए कर रहा है। इतिहास गवाह है पूरे विश्व में धर्म को लेकर मानव जाति का जितना ख़ून बहाया गया है उतना किसी दूसरे मुद्दे को लेकर नहीं। आख़िर हम कब इस तथ्य को जान पायेंगे? हम क्यों नहीं सोचते की हम सब मानव हैं। हमारी शारीरिक रचना एक जैसी है। ईश्वर या प्रकृति हमसे ज़रा भी भेद भाव नहीं करती। प्रकृति हवा-पानी, धूप, रात-दिन, आँधी-तूफ़ान, बाढ़-सूखा, दैवी आपदा आदि किसी में धर्म के आधार पर भेद भाव नहीं करती है। हम क्यों धर्म के नाम पर बटे हुए हैं? हम क्यों नहीं समूची मानव जाति को एक मानकर प्रेम और मोहब्बत से रहते हैं? धर्म के नाम पर कब तक मानव जाति का ख़ून बहाया जाता रहेगा ? यह प्रश्न हमारे सामने मुँह खोले खड़ा है। हमें जबाब देना ही होगा। हम कब तक इस सत्यता से आँखे बंद किया रहेगें?

अब्दुल समद
IAS U.P
7800217777
Email. Samadabdul1992@gamail.com

Note— Any body can respond.

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