BRAHAVISM

BRAHAVI HUMAN WELFARE & DEVELOPMENT TRUST.

BRAHAVISM क्या है?
Brahvism आधुनिक सभ्य समाज के दनिश्वर व आलिम लोगों की सोच है जो अल्लाह को उसकी किताब क़ुरान के मुताबिक सिर्फ़ रब्बूलआलमीन और रहमतुल्लिलआलमीन मानती है। यानी अल्लाह समूची सृष्टि या कायनात का रब है और उसके लिए रहमत है। अल्लाह, ईश्वर, god, सब एक है, उसके अलावा इबादत के लायक़ कोई माबूद नहीं है।मोहम्मद स० अल्लाह के रसूल हैं। क़ुरान के मुताबिक़ दुनियाँ में एक लाख चालीस हज़ार पैग़म्बर आए जिसमें मोहम्मद राम कृष्ण ईसा मूसा भी अल्लाह के भेजे हुए दूत या पैlग़म्बर हैं।
इंसान का इंसान से हो भाई चारा, यही पैग़ाम हमारा, यही पैग़ाम हमारा।
अल्लाह की नज़र में दुनिया के सभी लोग पहले इंसान हैं बाद में हिन्दू-मुस्लिम, यहूदी-ईसाई, शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरेलवी हैं। सोचो आज से क़रीब ८००० साल पहले जब आदमी जंगलों पेड़ों पहाड़ों गुफ़ाओं कन्दराओं में रहता था नंगे घूमता था, फल फूल कंद मूल खाकर और जानवरों का शिकार कर उसका गोश्त खाकर ज़िंदा रहता था तब उसका मझब कहाँ था ? क्या तब वह हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई यहूदी था? जबाब मिलेगा नहीं, वह सिर्फ़ इंसान था। हिन्दू मुस्लिम ईसाई यहूदी सिख जैन बुध शिया-सुन्नी देवबंदी-बरेलवी बाद में बना। समय के साथ-साथ इन भोले भाले इंसानों के बीच के कुछ चालाक लोगों ने उसे धर्मों में बाँट कर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई यहूदी बना दिया। उसका नाम करण कर दिया। और यह सिलसिला अभी थमा नहीं नहीं है। पिछले दो सौ सालों से आज तक उसे देवबंदी, बरेलवी कादीयानी, अहमदी, सल्फ़ी, अहले हदीस, तबलिगी जमाती न जाने क्या क्या बना दिया गयाहै, और आने वालों दिनों में न जाने क्या क्या बना दिया जायेगा। बरहवीसम का मक़सद हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई, यहूदी, शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरैलवी, छोटा-बड़ा, ऊँच-नींच से ऊपर उठकर सबको इंसान मानते हुए आपस में
सिर्फ़ इंसानी मोहब्बत, भाई-चार्गी व आपसी एकजहती को बनाए रखते हुए सभी धर्मों के सही उपदेशों को जनता तक पहुँचाना तथा सभी मज़हब व उसके मानने वालों का सम्मान करना है। सभी इंसान अशरफुल मखलूक हैं। सभी लोग अपने-अपने मुताबिक़ सही रास्ते पर चल रहे हैं। यह सिर्फ़ अल्लाह हाई बेहतर जानता है की कौन सही रास्ते पर चल रहा है कौन ग़लत। इसका फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह कर सकता है। क़ुरान करीम में अल्लाह इरशाद फ़रमाता है की—-1. इकरा बिस्म रब्बिकल लगी खलक खलकनल इंसान।
1. सुरा न.६ आयत न.१०८ अल ऐन आम— और जिन लोगों को ये मूसरीक अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, उनको बुरा न कहना की ये भी कहीं खुदा को बे अदबी से बे समझे बुरा न कह बैठे। इस तरह हमने हर फ़िरक़े के आमाल उनकी नज़रों में अछे कर दिखाये हैं। फिर उनको अपने परेवर दीगर ले पास जाना है, तब वह उनको बताएगा की वे क्या क्या किया करते थे।
2. ऐ नबी उन लोगों से कह दो की हर एक अपने तरीक़े पर चल रहा है। अब ये तुम्हारा रब ही बेहतर जनता है की सीधे रास्ते पर कौन है। 17/84 बनी इसरायील
3. और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी क़ुरान को मज़बूती से थामे रहो, आपसी फ़िरक़ों में न बँटो, और अल्लाह का यह इनाम अपने ऊपर याद रखो की जब तुम आपस में दुश्मन थे तो अल्लाह ने तुम्हारे दिलो में मोहब्बत डाल दी, तो तुम उसकी मेहरबानी से आपस में भाई भाई बन गये।
3/103 Sura Ale-Imran.
4.
जहाँ तक इस्लाम धर्म का सवाल है, चंद मज़हवी ठेकेदारों ने ग़लत व्याख्या कर इस्लाम के सही उपदेशों को दुनिया के सामने न रखकर इस्लाम को बदनाम कर रखा है तथा मुस्लिम समाज के ग़ैर पढ़े- लिखे व सीधे-साधे लोगों को फ़िरक़ों के नाम पर आपस में लड़ा कर बाँट रखा है। समूचा मुस्लिम समाज शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरैलवी, अहले-हदीश और तरह तरह के फ़िरक़ों व जातियों में बँटा हूवा है। सिर्फ़ बँटा हूवा ही नहीं है बल्कि एक दूसरे की जान का प्यासा भी है। बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है। कुछ लोगों ने बक़ायदा अपने
-अपने दीनी इदारों और अल्लाह के घर मस्जिदों को भी बाँट रखा है। एक दूसरे के पीछे नमाजें नहीं अदा करते। अल्लाह अल्लाह इस्लाम के चंद ठेकेदारों ने इस्लाम का क्या हाल कर रखा है। क्यों भाई, अपने कभी सोचा कि क्या इस्लाम इसकी इजाज़त देता है। क्या इस्लामी नुखते-नज़र से यह सही है? क्या आप ने कभी सोचा की इसकी वजह क्या है? क्यों ऐसा हो रहा है? मोहम्मद सo के ज़माने में तो ऐसा नहीं था। न शिया थे, न सुन्नी थे, न देव बंदी थे न बरैलवी थे। सभी मुसलमान थे। जो सिर्फ एक अल्लाह को मानते थे और अल्लाह के रसूल मोहम्मद सo को मानते थे। इसके अलावा कुछ भी न था। इस्लाम तो इसकी इजाज़त नहीं देता है। इस्लाम तो आपसी मोहब्बत, भाई चार्गी,व एकजहती की दावत देता है। इस्लाम का मतलब ही शांति और मोहब्बत है, तो फिर हम क्यों मज़हब के नाम पर, फ़िरक़ों के नाम पर, जाती के नाम पर नफ़रत फैला रहे, आपस में इंसानों को बाँट कर लड़ा रहे हैं। एक दूसरे का ख़ून बहा रहे हैं। एक दूसरे को ज़लील करते हैं। बुरे अल्फ़ाज़ों से नवाजते हैं, गालियाँ देते हैं? क्यों भाई हम ऐसा क्यों करते हैं। अल्लाह के बंदो अशरफुल मखलूक होकर क्या आप ने कभी इस मोटाल्लिक सोचने की ज़हमत गवारा किया, कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या इस्लाम ऐसे घिनौने काम की इजाज़त देता है? जबाब मिलेगा नहीं। इसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक वजह है। अपना- अपना वूल्लु सीधा करना, अपना अपना फ़ायदा सोचना, अपना अपना सिक्का चलाना, समाज में अपनी अपनी बरतरी साबित करना। इसकी क्या ज़रूरत है। इस्लाम में तो सभी एक समान हैं। सभी को अल्लाह ने अशरफ़ बनाया है। अल्लाह की नज़र में वही अफ़ज़ल है,वही बरतर है, जो मुट्टकि है, जिसके अंदर तकवा है।
AIMS
1. UNITY AMONG ALL HUMAN BEING——paste the article of Firkanparasti.
२. To strengthen the UNITY & INTEGRITY of INDIA.
3. To develop a thought that we are only a HUMAN BEING. Neither we are SHIYA—SHUNNI nor
DEO BANDI BRAILAVI .

2. To run the awareness programmes regarding to Modern Education as engineering, Medical Science, computer science, Science and Technology, Law, commercial Education, extra.
3. To Establish and run the Educational Institute as School College University Medical colleges Engineering College, Polytechnic Colleges and other College and Courses as per need .
4. To establish and run the Coaching Institutes for Minorities and other students.

5. To establish and run Centre for Peace and Centre for Excellence.
6. To provide the Coaching lodging and fooding facility to Intelligent and competent minority students selecting though process of entrance examination.
7. To promote the approach of Religious tolerance, Secularism, Equality, Fraternity, brotherhood, peace, love , Social Harmony, Kind, Liberal, Non discrimination and Respect towards women, children, Old ages , Handicapped, Underprivileged and Other Vulnerable Section of Society.
8. To condemn the Gender discrimination, Untouchability, Discrimination, Communalism, Forward Backwardness, Hatred, Nepotism , Regionalism, Social devision, Caste System and likewise.
9. To run the programme of women empowerment
10. To conduct the programme of Awareness in the weaker and vulnerable section of the society regarding education, Human rights, Government Policies Plans Scheme and Programmes and lile wise.
11. To point out the problem of Women, Child, Underprivileged, SC ST Minority and other vulnerable section of society.
12. To run the Motivational and Coaching institute for Minority Students.
13. To promote the scientific and Liberal approach among the people.
14. To promote the spirit of communal harmony among the followers of different religions Groups Sects, Cults and Community.

15. Reforms of Muslim Society.

 मुस्लिम खावटीनों को मज़ार व दरगाहों में जाना चाहिये।
 मुस्लिम औरतों को मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी आयत नहीं करनी चाहिये। वे मस्जिदों में नमाज़ पढ़ना चाहे तो पढ़ सकती हैं
जब अल्लाह ने मर्दों और औरतों को अलग अलग बनाया है तो औरतें मर्दों की बराबरी क्यों करती हैं।
By मौलाना साजिद रशीडी. President of All India Malayan
 औरतों को नक़ाब लगाने के लिए मजबूर न किया जाय। वे चाहे लगायें या न लगायें।

16. Modern Education
17. मशावात– औरत और मर्दों को एक समान मानना चाहिए। दोनों को बराबर आज़ादी होनी चाहिए। इस्लाम डोनो में भेद भाव नहीं करता है। शरीयत का क़ानून मर्द और औरत दोनों परलागू होना चाहिए, न की सिर्फ़ औरतों पर। ऐसा न हो की औरतों पर शरीयत और मज़हबी क़ानून लागू कराया जाय और मर्दों को छोड़ दिया जाय। जैसा कि हो रहा है। अगर कोई लड़की या औरत शॉर्ट कपड़े पहन कर कोई खेल खेलती है तो फ़तवा, फ़िल्मों में काम करती है तो फ़तवा, नाच गाना करती है तो फ़तवा, नौकरी करती है तो फ़तवा, समाज में बराबरी के लिए जेड्डो जहद करती है तो फ़तवा। वाह भाई वाह सारी पाबंदी सिर्फ़ औरतों के लिए क्यों। फ़तवा की दुकानें सिर्फ़ औरतों से चलेंगीं क्या।
तलाक़ देने का हक़ औरतों और मर्दों दोनों को होना चाहिए, या दोनों की रज़ामंदी से होना चाहिए ना की एकतरफ़ा मर्दों को। क्यों की मुस्लिम मैरिज एक कांट्रैक्ट है। निकाह दोनों की रज़ामंदी से होता है तो तलाक़ एकतरफ़ा क्यों?
18. जो टौहीद को यानी अल्लाह को एक मानता है, अल्लाह के सिवा को किसी को इबादत के लायक नहीं मानता और मोहम्मद स० आलै० वसल्लाम को अल्लाह का रशूल मानता है वही मुस्लिम है। इस टौहीद को मनाने वाले सभी मुस्लिम हैं, न शिया न सुन्नी, न देवबंदी न बरैलवी, न अहले हदीश। सभी मुस्लिम हैं। किसी को किसी को बुरा भला कहने का किसी को हक़ नहीं है। सभी अश्रफुल मखलूक है। किसी को इस्लाम से ख़ारिज करने का फ़तवा जारी नहीं करना चाहिए। टौहीद के मानने वाले को इस्लाम से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोगों को ऐसे फ़तवे से बाज़ आना चाहिए। वरना सभी मुस्लिम इस्लाम से ख़ारिज हो जाएगें। कौन बचेगा।
19. फ़तवे की दुकानें बंद होनी चाहिए— क्या फ़तवे सिर्फ़ औरतों के लिये ही हैं। मर्दों के लिए क्यों नहीं जारी किए जाते हैं।

 

20. MUSLIM WOMEN EMPOWERMENT MISSION.
1. नक़ाब का ख़ात्मा।
2. हलाला प्रथा का ख़ात्मा।
3. औरतों पर किसी भी तरह की पाबंदी न लगाई जाय, मर्दों की तरह उन्हें भी हर तरह के कार्यों को करने की छूट होनी चाहिए।ख़ात्मा
4. औरत व मर्द को बराबर का हक़ व फ़राज़।
5. बच्चियों को भी पढ़ने के लिए बच्चों की तरह बाहर भेजा जाय।
6. बच्चा पैदा न होने या बार बार लड़की पैदा होने पर सिर्फ़ औरत को दोषी मानकर उसे प्रताड़ित न किया जाय।
7. लड़कों की तरह लड़कियों को भी सर्विस किसानी तेज़ारत सियासत व दीगर areas में काम करने व चढ़- बढ़ कर हिस्सा लेने की खुली छूट होनी चाहिए।
8. लड़कों की तरह लड़कियों को माडर्न एजुकेशन देना चाहिये। इसके किसी तरह का फ़र्क़ न किया जाय।
9. औरतों पर फ़तवा देने पर क़ानून बना कर पाबंदी लगायी जाय। ऐसा करने वालों को सज़ा देने का प्रविज़न होना चाहिए।
10. तलाक़ देने का हक़ औरतों को भी मिलना चाहिए।

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