ORIGIN OF RELIGIONS

ORIGIN AND DEVELOPMENT OF RELIGION

“धर्म शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, -असत्य, अचार- विचार, नीति-अनीति की अचार संहिता है जिसकी उत्पत्ति इसके माध्यम से अति प्राचीन काल में मानव में भय उत्पन्न कर सभ्यता व संस्कृति के विकास में आए गतिरोध को समाप्त करने तथा समाज को नियंत्रित व गतिशील बनाए रखने के लिए की गयी थी।”

मानव सभ्यता व संस्कृति के विकास के अध्ययन से मालूम होता है की ज़माना-ए- क़दीम में (अति प्राचीन काल में) आबादी बढ़ने व भोजन की कमी होने की वजह से मानव जंगलों पहाड़ों गुफ़ाओं कंडराओ से निकल कर मैदानों में आकर जंगलो को साफ़ कर रहने के लिए घास पूस के छप्पर बनाने लगा, खाने पीने के लिए कृषि व पशुपालन करने लगा, हिफ़ाज़त के लिए बस्तियाँ बसा कर कबीलों में रहने लगा। इस समय शासन पुलिस क़ानून अदालत नहीं थी, जो कबीला ताक़तवर होता था वह दूसरे क़बीले व लोगों के खेतों, पशुओं, मकानों व सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा कर उन्हें खदेड़ देता था। फलस्वरूप लोग पुनः जंगलों पहाड़ों में भागने लगे। इससे मानव सभ्यता व संस्कृत के विकास में अवरोध उत्पन्न होने लगा। समाज में अराजकता उत्पन्न होनी लगी। इसी समय कुछ मनीषी व बुद्धि जीवी लोगों ने एक ऐसी ब्यवस्था तथा लोक- ब्यावहार की रचना की तथा प्रचार प्रसार किया जिसके द्वारा लोग स्वम नियंत्रित होकर ग़लत तथा अन्नयाय पूर्ण कार्यों जैसे किसी की सम्पत्ति, खेत, मकान, पशु पर क़ब्ज़ा करना, चोरी व बेमानी करना, बलात्कार करना, किसी को डराना धमकाना, मरना पीटना, हत्या करना, आदि ना करे। इस ब्यवस्था के अंतर्गत लोगों को भयभीत कर स्वयं को नियंत्रित करने के लिए पाप-पुण्य, स्वर्ग- नरक, शुभ- अशुभ, धर्म -अधर्म, नीति-अनीति, दंड-पुरस्कार, कर्म-फल, पुनर्जन्म, सत्य-असत्य, देवी-देवताओं तथा ईश्वर जैसी अदृश्य शक्तियों की कल्पना की गयी। समस्त प्राकृतिक गतिविघियों को ईश्वर द्वारा घटित कहकर दैवी घटना के रूप में प्रचारित किया गया । इन प्राकृतिक गतिविधियों जैसे पानी बरसना, बादलों का गरजना, बिजली का चमकना, बाढ़ आना, सूखा पड़ना, आँधी तूफ़ान बवंडर का आना, सूरज का निकलना, रात का होना, सूर्या व चंद्र ग्रहण लगना आदि का मूर्तिकरन किया गया। सभी घटनाओं को किसी ना किसी देवी- देवता से जोड़ दिया गया। इसी ब्यवस्था तथा लोक- ब्यवहार रूपी नैतिक अचार संहिता को बाद में धर्म कहा जाने लगा। समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता गया। हर धर्म के अलग अलग मानने वाले हो गये। अलग अलग व्याख्या की जाने लगी। सरल शब्दों में धर्म को परिभासित करते हुए कहा जा सकता है कि “ धर्म एक, अचार- विचार, नीति-अनीति, शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, सत्य-असत्य की अचार संहिता है जिसकी उत्पत्ति अति प्राचीन काल में मानव सभ्यता व संस्कृति के विकास में आए गतिरोध को समाप्त करने तथा सामाजिक ब्यवस्था को बनाए रखने के लिए की गयी थी”। इसकी उत्तपत्ति आज से लगभग 2600 से 4000 साल पहले 6th century BC से 20th century bc के आप पास हुई।
बिना पुलिस, क़ानून तथा अदालत के हज़ारों साल तक समाज को इसी के माध्यम से गतिशील व नियंत्रित किया जाता रहा है। आज भी लोग इसी व्यवस्था से स्वम नियंत्रित होकर अचार- ब्यवहार करते हैं। हम आज भी पाप-पुण्य, स्वर्ग- नरक, शुभ- अशुभ, ग़लत- सही से डर कर व प्रेरित होकर आचरण करते हैं। जितना हम मौजूदा क़ानून से नहीं डरते उससे ज़्यादा इन काल्पनिक धारणाओं से डरते हैं। आधुनिक और सभ्य समाज में इसे धर्म का नाम दे दिया गया। धीरे- धीरे इस पर कट्टरता धर्मांधता का आवरण चढ़ा दिया गया। समय के साथ- साथ इसके साथ बहुत सी कुरीतियाँ, अंधविश्वास, परम्परा, रीति-रिवाजों को जोड़ दिया गया। आज धर्म मानव जाति की हत्या, शोषण, अत्याचार डराने-धमकाने, नफ़रत फैलाने, समाज को बाँटने, एवं लड़ाने, भेद- भाव करने, ऊँच- नींच, छूवाछूट फैलाने, का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। वर्तमान दुनिया का सभ्य मानव धर्म का इस्तेमाल सामाजिक ब्यवस्था को बनाए रखने के स्थान पर मानव जाति के संहार के लिए कर रहा है। इतिहास गवाह है पूरे विश्व में धर्म को लेकर मानव जाति का जितना ख़ून बहाया गया है उतना किसी दूसरे मुद्दे को लेकर नहीं। आख़िर हम कब इस तथ्य को जान पायेंगे? हम क्यों नहीं सोचते की हम सब मानव हैं। हमारी शारीरिक रचना एक जैसी है। ईश्वर या प्रकृति हमसे ज़रा भी भेद भाव नहीं करती। प्रकृति हवा-पानी, धूप, रात-दिन, आँधी-तूफ़ान, बाढ़-सूखा, दैवी आपदा आदि किसी में धर्म के आधार पर भेद भाव नहीं करती है। हम क्यों धर्म के नाम पर बटे हुए हैं? हम क्यों नहीं समूची मानव जाति को एक मानकर प्रेम और मोहब्बत से रहते हैं? धर्म के नाम पर कब तक मानव जाति का ख़ून बहाया जाता रहेगा ? यह प्रश्न हमारे सामने मुँह खोले खड़ा है। हमें जबाब देना ही होगा। हम कब तक इस सत्यता से आँखे बंद किया रहेगें?

अब्दुल समद
IAS U.P
7800217777
Email. Samadabdul1992@gamail.com

Note— Any body can respond.

BRAHAVISM

BRAHAVI HUMAN WELFARE & DEVELOPMENT TRUST.

BRAHAVISM क्या है?
Brahvism आधुनिक सभ्य समाज के दनिश्वर व आलिम लोगों की सोच है जो अल्लाह को उसकी किताब क़ुरान के मुताबिक सिर्फ़ रब्बूलआलमीन और रहमतुल्लिलआलमीन मानती है। यानी अल्लाह समूची सृष्टि या कायनात का रब है और उसके लिए रहमत है। अल्लाह, ईश्वर, god, सब एक है, उसके अलावा इबादत के लायक़ कोई माबूद नहीं है।मोहम्मद स० अल्लाह के रसूल हैं। क़ुरान के मुताबिक़ दुनियाँ में एक लाख चालीस हज़ार पैग़म्बर आए जिसमें मोहम्मद राम कृष्ण ईसा मूसा भी अल्लाह के भेजे हुए दूत या पैlग़म्बर हैं।
इंसान का इंसान से हो भाई चारा, यही पैग़ाम हमारा, यही पैग़ाम हमारा।
अल्लाह की नज़र में दुनिया के सभी लोग पहले इंसान हैं बाद में हिन्दू-मुस्लिम, यहूदी-ईसाई, शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरेलवी हैं। सोचो आज से क़रीब ८००० साल पहले जब आदमी जंगलों पेड़ों पहाड़ों गुफ़ाओं कन्दराओं में रहता था नंगे घूमता था, फल फूल कंद मूल खाकर और जानवरों का शिकार कर उसका गोश्त खाकर ज़िंदा रहता था तब उसका मझब कहाँ था ? क्या तब वह हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई यहूदी था? जबाब मिलेगा नहीं, वह सिर्फ़ इंसान था। हिन्दू मुस्लिम ईसाई यहूदी सिख जैन बुध शिया-सुन्नी देवबंदी-बरेलवी बाद में बना। समय के साथ-साथ इन भोले भाले इंसानों के बीच के कुछ चालाक लोगों ने उसे धर्मों में बाँट कर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई यहूदी बना दिया। उसका नाम करण कर दिया। और यह सिलसिला अभी थमा नहीं नहीं है। पिछले दो सौ सालों से आज तक उसे देवबंदी, बरेलवी कादीयानी, अहमदी, सल्फ़ी, अहले हदीस, तबलिगी जमाती न जाने क्या क्या बना दिया गयाहै, और आने वालों दिनों में न जाने क्या क्या बना दिया जायेगा। बरहवीसम का मक़सद हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई, यहूदी, शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरैलवी, छोटा-बड़ा, ऊँच-नींच से ऊपर उठकर सबको इंसान मानते हुए आपस में
सिर्फ़ इंसानी मोहब्बत, भाई-चार्गी व आपसी एकजहती को बनाए रखते हुए सभी धर्मों के सही उपदेशों को जनता तक पहुँचाना तथा सभी मज़हब व उसके मानने वालों का सम्मान करना है। सभी इंसान अशरफुल मखलूक हैं। सभी लोग अपने-अपने मुताबिक़ सही रास्ते पर चल रहे हैं। यह सिर्फ़ अल्लाह हाई बेहतर जानता है की कौन सही रास्ते पर चल रहा है कौन ग़लत। इसका फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह कर सकता है। क़ुरान करीम में अल्लाह इरशाद फ़रमाता है की—-1. इकरा बिस्म रब्बिकल लगी खलक खलकनल इंसान।
1. सुरा न.६ आयत न.१०८ अल ऐन आम— और जिन लोगों को ये मूसरीक अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, उनको बुरा न कहना की ये भी कहीं खुदा को बे अदबी से बे समझे बुरा न कह बैठे। इस तरह हमने हर फ़िरक़े के आमाल उनकी नज़रों में अछे कर दिखाये हैं। फिर उनको अपने परेवर दीगर ले पास जाना है, तब वह उनको बताएगा की वे क्या क्या किया करते थे।
2. ऐ नबी उन लोगों से कह दो की हर एक अपने तरीक़े पर चल रहा है। अब ये तुम्हारा रब ही बेहतर जनता है की सीधे रास्ते पर कौन है। 17/84 बनी इसरायील
3. और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी क़ुरान को मज़बूती से थामे रहो, आपसी फ़िरक़ों में न बँटो, और अल्लाह का यह इनाम अपने ऊपर याद रखो की जब तुम आपस में दुश्मन थे तो अल्लाह ने तुम्हारे दिलो में मोहब्बत डाल दी, तो तुम उसकी मेहरबानी से आपस में भाई भाई बन गये।
3/103 Sura Ale-Imran.
4.
जहाँ तक इस्लाम धर्म का सवाल है, चंद मज़हवी ठेकेदारों ने ग़लत व्याख्या कर इस्लाम के सही उपदेशों को दुनिया के सामने न रखकर इस्लाम को बदनाम कर रखा है तथा मुस्लिम समाज के ग़ैर पढ़े- लिखे व सीधे-साधे लोगों को फ़िरक़ों के नाम पर आपस में लड़ा कर बाँट रखा है। समूचा मुस्लिम समाज शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरैलवी, अहले-हदीश और तरह तरह के फ़िरक़ों व जातियों में बँटा हूवा है। सिर्फ़ बँटा हूवा ही नहीं है बल्कि एक दूसरे की जान का प्यासा भी है। बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है। कुछ लोगों ने बक़ायदा अपने
-अपने दीनी इदारों और अल्लाह के घर मस्जिदों को भी बाँट रखा है। एक दूसरे के पीछे नमाजें नहीं अदा करते। अल्लाह अल्लाह इस्लाम के चंद ठेकेदारों ने इस्लाम का क्या हाल कर रखा है। क्यों भाई, अपने कभी सोचा कि क्या इस्लाम इसकी इजाज़त देता है। क्या इस्लामी नुखते-नज़र से यह सही है? क्या आप ने कभी सोचा की इसकी वजह क्या है? क्यों ऐसा हो रहा है? मोहम्मद सo के ज़माने में तो ऐसा नहीं था। न शिया थे, न सुन्नी थे, न देव बंदी थे न बरैलवी थे। सभी मुसलमान थे। जो सिर्फ एक अल्लाह को मानते थे और अल्लाह के रसूल मोहम्मद सo को मानते थे। इसके अलावा कुछ भी न था। इस्लाम तो इसकी इजाज़त नहीं देता है। इस्लाम तो आपसी मोहब्बत, भाई चार्गी,व एकजहती की दावत देता है। इस्लाम का मतलब ही शांति और मोहब्बत है, तो फिर हम क्यों मज़हब के नाम पर, फ़िरक़ों के नाम पर, जाती के नाम पर नफ़रत फैला रहे, आपस में इंसानों को बाँट कर लड़ा रहे हैं। एक दूसरे का ख़ून बहा रहे हैं। एक दूसरे को ज़लील करते हैं। बुरे अल्फ़ाज़ों से नवाजते हैं, गालियाँ देते हैं? क्यों भाई हम ऐसा क्यों करते हैं। अल्लाह के बंदो अशरफुल मखलूक होकर क्या आप ने कभी इस मोटाल्लिक सोचने की ज़हमत गवारा किया, कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या इस्लाम ऐसे घिनौने काम की इजाज़त देता है? जबाब मिलेगा नहीं। इसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक वजह है। अपना- अपना वूल्लु सीधा करना, अपना अपना फ़ायदा सोचना, अपना अपना सिक्का चलाना, समाज में अपनी अपनी बरतरी साबित करना। इसकी क्या ज़रूरत है। इस्लाम में तो सभी एक समान हैं। सभी को अल्लाह ने अशरफ़ बनाया है। अल्लाह की नज़र में वही अफ़ज़ल है,वही बरतर है, जो मुट्टकि है, जिसके अंदर तकवा है।
AIMS
1. UNITY AMONG ALL HUMAN BEING——paste the article of Firkanparasti.
२. To strengthen the UNITY & INTEGRITY of INDIA.
3. To develop a thought that we are only a HUMAN BEING. Neither we are SHIYA—SHUNNI nor
DEO BANDI BRAILAVI .

2. To run the awareness programmes regarding to Modern Education as engineering, Medical Science, computer science, Science and Technology, Law, commercial Education, extra.
3. To Establish and run the Educational Institute as School College University Medical colleges Engineering College, Polytechnic Colleges and other College and Courses as per need .
4. To establish and run the Coaching Institutes for Minorities and other students.

5. To establish and run Centre for Peace and Centre for Excellence.
6. To provide the Coaching lodging and fooding facility to Intelligent and competent minority students selecting though process of entrance examination.
7. To promote the approach of Religious tolerance, Secularism, Equality, Fraternity, brotherhood, peace, love , Social Harmony, Kind, Liberal, Non discrimination and Respect towards women, children, Old ages , Handicapped, Underprivileged and Other Vulnerable Section of Society.
8. To condemn the Gender discrimination, Untouchability, Discrimination, Communalism, Forward Backwardness, Hatred, Nepotism , Regionalism, Social devision, Caste System and likewise.
9. To run the programme of women empowerment
10. To conduct the programme of Awareness in the weaker and vulnerable section of the society regarding education, Human rights, Government Policies Plans Scheme and Programmes and lile wise.
11. To point out the problem of Women, Child, Underprivileged, SC ST Minority and other vulnerable section of society.
12. To run the Motivational and Coaching institute for Minority Students.
13. To promote the scientific and Liberal approach among the people.
14. To promote the spirit of communal harmony among the followers of different religions Groups Sects, Cults and Community.

15. Reforms of Muslim Society.

 मुस्लिम खावटीनों को मज़ार व दरगाहों में जाना चाहिये।
 मुस्लिम औरतों को मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी आयत नहीं करनी चाहिये। वे मस्जिदों में नमाज़ पढ़ना चाहे तो पढ़ सकती हैं
जब अल्लाह ने मर्दों और औरतों को अलग अलग बनाया है तो औरतें मर्दों की बराबरी क्यों करती हैं।
By मौलाना साजिद रशीडी. President of All India Malayan
 औरतों को नक़ाब लगाने के लिए मजबूर न किया जाय। वे चाहे लगायें या न लगायें।

16. Modern Education
17. मशावात– औरत और मर्दों को एक समान मानना चाहिए। दोनों को बराबर आज़ादी होनी चाहिए। इस्लाम डोनो में भेद भाव नहीं करता है। शरीयत का क़ानून मर्द और औरत दोनों परलागू होना चाहिए, न की सिर्फ़ औरतों पर। ऐसा न हो की औरतों पर शरीयत और मज़हबी क़ानून लागू कराया जाय और मर्दों को छोड़ दिया जाय। जैसा कि हो रहा है। अगर कोई लड़की या औरत शॉर्ट कपड़े पहन कर कोई खेल खेलती है तो फ़तवा, फ़िल्मों में काम करती है तो फ़तवा, नाच गाना करती है तो फ़तवा, नौकरी करती है तो फ़तवा, समाज में बराबरी के लिए जेड्डो जहद करती है तो फ़तवा। वाह भाई वाह सारी पाबंदी सिर्फ़ औरतों के लिए क्यों। फ़तवा की दुकानें सिर्फ़ औरतों से चलेंगीं क्या।
तलाक़ देने का हक़ औरतों और मर्दों दोनों को होना चाहिए, या दोनों की रज़ामंदी से होना चाहिए ना की एकतरफ़ा मर्दों को। क्यों की मुस्लिम मैरिज एक कांट्रैक्ट है। निकाह दोनों की रज़ामंदी से होता है तो तलाक़ एकतरफ़ा क्यों?
18. जो टौहीद को यानी अल्लाह को एक मानता है, अल्लाह के सिवा को किसी को इबादत के लायक नहीं मानता और मोहम्मद स० आलै० वसल्लाम को अल्लाह का रशूल मानता है वही मुस्लिम है। इस टौहीद को मनाने वाले सभी मुस्लिम हैं, न शिया न सुन्नी, न देवबंदी न बरैलवी, न अहले हदीश। सभी मुस्लिम हैं। किसी को किसी को बुरा भला कहने का किसी को हक़ नहीं है। सभी अश्रफुल मखलूक है। किसी को इस्लाम से ख़ारिज करने का फ़तवा जारी नहीं करना चाहिए। टौहीद के मानने वाले को इस्लाम से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोगों को ऐसे फ़तवे से बाज़ आना चाहिए। वरना सभी मुस्लिम इस्लाम से ख़ारिज हो जाएगें। कौन बचेगा।
19. फ़तवे की दुकानें बंद होनी चाहिए— क्या फ़तवे सिर्फ़ औरतों के लिये ही हैं। मर्दों के लिए क्यों नहीं जारी किए जाते हैं।

 

20. MUSLIM WOMEN EMPOWERMENT MISSION.
1. नक़ाब का ख़ात्मा।
2. हलाला प्रथा का ख़ात्मा।
3. औरतों पर किसी भी तरह की पाबंदी न लगाई जाय, मर्दों की तरह उन्हें भी हर तरह के कार्यों को करने की छूट होनी चाहिए।ख़ात्मा
4. औरत व मर्द को बराबर का हक़ व फ़राज़।
5. बच्चियों को भी पढ़ने के लिए बच्चों की तरह बाहर भेजा जाय।
6. बच्चा पैदा न होने या बार बार लड़की पैदा होने पर सिर्फ़ औरत को दोषी मानकर उसे प्रताड़ित न किया जाय।
7. लड़कों की तरह लड़कियों को भी सर्विस किसानी तेज़ारत सियासत व दीगर areas में काम करने व चढ़- बढ़ कर हिस्सा लेने की खुली छूट होनी चाहिए।
8. लड़कों की तरह लड़कियों को माडर्न एजुकेशन देना चाहिये। इसके किसी तरह का फ़र्क़ न किया जाय।
9. औरतों पर फ़तवा देने पर क़ानून बना कर पाबंदी लगायी जाय। ऐसा करने वालों को सज़ा देने का प्रविज़न होना चाहिए।
10. तलाक़ देने का हक़ औरतों को भी मिलना चाहिए।

EVOLUTION OF HUMAN BEING

हमारी पृथ्वी लगभग ४६० करोर पुरानी है। यह पहले एक आग की गोला थी, धीरे धीरे ठंडी हुई। ३५० करोड़ साल बाद एक कोशिय जीव का विकास हुआ, फिर दो तीन और अधिक कोशिका वाले जीवों का विकास हुआ। हमारा पूराना घर पनी है। लगभग ३३ करोड़ साल पहले मछलियों की उत्पत्ति हुई। उसके बाद अमफिबीयंस उभयचर- साँप,छिपकली और डायनासोर—reptiles—birds-Mammals स्तनधारी और चौपायों का जन्म हुआ।आज से लगभग ७ करोड़ साल पहले रेगने वाले जीवों से स्तनधारी जीवों का विकास हूवा। चूहा tiger lion भी इसी समय विकसित हुए। इस तरह ३६० करोड़ साल के क्रमिक विकास के परिणामस्वरूप earth पर जीवों की उत्पत्ति हुई।
लगभग ६ करोड़ साल बाद बंदरों का जन्म हुआ। ये पेड़ों पर फल फ़ूल पत्तियाँ खाकर रहते थे तथा security purpose से उसी पर रहते थे।आबादी बढ़ने की वजह से पेट भरने के लिए इनमें से कुछ बंदर ज़मीन पर रहने का फ़ैसला कर लिया। ज़मीन पर रहने वाले इन बंदरों को Scientist रमपिथिकस कहते हैं। ज़मीन पर आने के बाद कुछ बंदरों ने अपने पिछले पैर पर खड़ा होने लगे। आगे का हाथ फ़्री हो गया, जिससे वे कुछ और काम करने लगे। इसको HOMOERCTUS कहते हैं।

4.6 बिलियन वर्ष इतिहास में जीवन का इतिहास इस प्रकार है-
• पिछले 3.6 बिलियन वर्षों तक, सरल कोशिकाएँ (prokaryotes);
• पिछले 3.4 बिलियन वर्षों तक, स्यानोबैकेटीरिया (cyanobacteria) प्रकाश संश्लेषण करता रहा;
• पिछले 2 बिलियन वर्षों तक, जटिल कोशिकाएँ (eukaryotes);
• for the last 1 billion years, multicellular life;
• पिछले 600 मिलियन वर्षों तक, सरल जन्तु;
• for the last 550 million years, bilaterians, water life forms with a front and a back;
• for the last 500 million years, fish and proto-amphibians;
• for the last 475 million years, land plants;
• for the last 400 million years, insects and seeds;
• for the last 360 million years, amphibians;
• for the last 300 million years, reptiles;
• for the last 200 million years, mammals;
• for the last 150 million years, birds;
• for the last 130 million years, flowers;
• for the last 60 million years, the primates,
• for the last 20 million years, the family Hominidae (great apes);
• for the last 2.5 million years, the genus Homo (human predecessors);
• for the last 200,000 years, anatomically modern humans.
Periodic extinctions have temporarily reduced diversity, eliminating:
• 2.4 billion years ago, many obligate anaerobes, in the oxygen catastrophe;
• 252 million years ago, the trilobites, in the Permian–Triassic extinction event;
• 66 million years ago, the pterosaurs and nonavian dinosaurs, in the Cretaceous–Paleogene extinction event.

BACKWARDNESS OF MUSLIMS

Why the Muslims are backward and worst community of the world?
Answer– First, Allah does not belong only to Miya community.He is not miyan. He is for all human being of the world. He is not only for Muslims.He is for all. Kuran says him RABBUL ALMIN and RAHMTULLILALMIN. But Muslims think Allah is only for Muslims. Muslims had to hate to discoveries and inventions, science, technologies, modernity, modern education.They said it KUFRA. He thought that all these things have been done by Europeans and Americans, but it is not truth, reality is this that all those things have been done by GOD. Christians are only mediums.God have made him mediums. Why God made him mediums not to Muslims? This is serious QUESTIONS. I thinks that they accepted the changes and adopt the modernity, science and technology, modernisation, modern Education, but Muslims did not do so, therefore God did not made him mediums.
Second reason of Muslim backwardNESS is the over dependency on ALLAH. It is believed or blind faith of the maximum majority of muslims that ALLAH do every things. Without sweat will of ALLAH nothing happens. कुछ भी नहीं होता। ज़्यादातर मुसलमानों की यही सोच उन्हें strggle करने से रोकती है। ये यही सोच कर बैठ जाते हैं कि अल्लाह की जैसी मर्ज़ी मेरे करने से कुछ नहीं होता। सब कुछ अल्लाह के हाथ में है। अल्लाह जो करेगा वही होगा। ये सोच कहीं न कहीं इंसान को निकम्मा बनाती है जो उसकी ग़रीबी और पिछड़ेपन की वजह बनती है। जब की इस्लाम की teaching ठीक इसके apposit है। इस्लाम मूसलसल continuous जद्दो-जहद और STRUGGLE पैग़ाम देता है। ज़्यादातर लोग इसकी ग़लत ब्याख्या करते हैं।
तीसरे कुछ लोगों की ऐसी सोच है की अल्लाह ग़रीबों मजलूमों और मिशकिनो को ज़्यादा पसंद करता है। ये लोग अल्लाह के ज़्यादा क़रीब होते हैं। मैंने अक्सर तकरीरों में सुना है। बेशक ये सही बात है लेकिन इसका ये हरगिज़ मतलब नहीं है की अल्लाह मालदार और अमीर लोगों को पसंद नहीं करता है। अल्लाह सबको पसंद करता है। उसके क़रीब वही है जो पहरेज़दार है जिसके अंदर तकवा है। इस तरह की सोच भी इंसान को निकम्मा बनाती है।
तीसरे clergy उलेमा, मौलाना मौलवी जिसकी बात लगभग ९० फ़ीसद मुस्लिम मानतें हैं ये सिर्फ़ दीन मज़हब की बातों मेन उलझे रहते हैं इनको शरीयत फ़तवा,तलाक़,निकाह, तबलीग से ही फ़ुरसत नहीं मिलती। ये दुनियाबी बात करते ही नहीं हैं। modern education सियासत ग़रीबी बेरोज़गारी नौकरी उत्पिरन आदि की बात करते ही नहीं हैं। ये या तो ज़मीन के अंदर क़ब्र की बत करेंगे या आसमान की। दुनिया या ज़मीन की बत ये करते ही नहीं हैं।

Islam and Humanity

Allah does not belong only to Miya community. मुस्लिम अल्लाह को मियाँ कहते हैं। क्या अल्लाह की कोई जाति या मज़हब है। बेशक नहीं। He is for all human being of the world. He is not only for Musslims. He is for all. Kuran says him RABBUL ALMIN RAB UL ALMEEN. But Muslims think Allah is only for Muslims. No not at all.

क़ुरान ईसाई और यहूद को भी अल्लाह की औलाद मानता है। इकरआ बिस्म रब्बिकल लजी खलक खलकनल इंसान।

बंदे मातरम् और मुस्लिम

मेरा निजी विचार है कि मुसलमानों को भारत माता की जय और बंदे मातरम् गाना चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है। इस्लाम में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। यह मादरे वतन का हिंदी अनुवाद है। इस्लाम में वतन का बहुत ख़ूबसूरत तसव्वर किया गया है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता है। इस्लाम अमन और मोहब्बत का पैग़ाम देता है। इस तरह की तंग ख़याली और तंग नज़री की इस्लाम में कोई जगह नहीं है। इस्लाम सबको साथ लेकर चलने और सबको बराबर इज़्ज़त देने वाला मज़हब है। माँ की बंदना कहने से मुझे नहीं लगता है कि यह अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना है। अल्लाह पुरे कायनात सृष्टि का रब है किसी मज़हब विशेष का नहीं। क़ुरान में अल्लाह को रब्बूलालमिन और रहमतुल्लिल आलमीन कहा गया है। यह कहाँ से शीरक हो सकता है। इस्लाम में माँ को बहुत दर्जा बुलंद मोकाम दिया गया है। माँ के पैर तले जन्नत है ऐसा कहा जाता है। SHIRK के बिना पर इसकी मुख़ालफ़त तो नहीं की जानी चाहिए। इसके अलावा अगर कोई वजह हो तो प्लीज़ coment करें।

REALITY OF SHAHEEN BAG PROTEST

शाहीन बाग़ ही क्या पुरे मुल्क में और पुरे मुल्क में ही क्या बल्कि पूरी दुनिया में मुस्लिम महिलायें घर की चारदीवारी से निकल कर सड़कों पर अपनी नाराज़गी और ग़ुस्से का इज़हार कर रही हैं। हिंदुस्तान में देखा जाय तो शाहीन बाग़ ही नहीं बल्कि हज़ारों जगह औरतें ख़ासकर मुस्लिम औरतें PROTEST कर रहीं हैं। क्या इसकी असली वजह CAA और NRC ही है? इस पर बहुत संजीदगी से ग़ौर करने की ज़रूरत है। मुझे लगता है कि CAA और NRC मुस्लिम औरतों का घरों से निकल कर सड़कों पर आकर धरना देने और प्रदर्शन करने की फ़ौरी वजह हो सकती है लेकिन इसकी असली वजह कुछ और ही है। मुझे लगता है की इसकी असली वजह मुस्लिम औरतों पर लगाई गयी वह एकतरफ़ा पाबंदी है,शोषण और वह उत्पीड़न है जो सदियों से कभी मज़हब के नाम पर, कभी शरीयत के नाम पर,कभी परदे के नाम पर,कभी तलाक़ के नाम पर, कभी हलाला के नाम पर,कभी फ़तवे के नाम पर, कभी पहनावा के नाम पर किया जाता रहा है। अब इन औरतों को एक ख़ूबसूरत मौक़ा मिल गया है अपने अंदर भरी हुई नफ़रत और नाराज़गी के इज़हार करने का। पहले भी मुस्लिम औरतें अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रहीं हैं लेकिन शरीयत और मज़हब के नाम पर उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता था। अब ऐसा कोई नहीं कर रहा है। अब कोई नहीं कह रहा है कि औरतों का इस तरह से बे पर्दा होकर सड़क चौराहों और अन्य जगहों पर मर्दों के बीच बैठ कर धरना प्रदर्शन करना शरीयत के ख़िलाफ़ है। बे पर्दगी हो रही है। अब कोई फ़तवा जारी नहीं हो रहा है।
CAA और NRC का बहाना ना होता तो न जाने अब तक क्या क्या हो जाता। कैसे कैसे बयान दिए जाते। फ़तवा जारी हो चुका होता। शरीयत और मज़हब की ब्याख्या करने वालों की लाइन लग गयी होती। अब कोई नहीं बोल रहा रहा है। TV debates में यह बोलने वाले लोग की ” जब अल्लाह ने मुस्लिम मर्दों को अलग अलग बनाया है तो औरतें मर्दों की बराबरी क्यों कर रही हैं।” अब ऐसी सोच के लोग कहाँ है।
सवाल यह उठता है की मुस्तकबिल में जब औरतें अपने हकूक के लिए आवाज़ उठायेंगीं तो क्या तब भी शरीयत और मज़हब के ठेकेदार शरीयत के नाम पर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिस करेंगे,m
उनको घर की चारदीवारी में परदे के नाम पर क़ैद करने की कोशिस करेंगे। मुझे लगता है की ऐसे लोग अपनी हरकतों से तो बाज़ नहीं आयेंगे। कोशिस तो ज़रूर करेंगे, मुँह की खायेंगे। ऐसी सोच के लोगों को अब शाहीन बाग़ से सबक़ लेना चाहिये। औरतों की बेचैनी और दर्द को समझना चाहिए। भविष्य में उनके साथ बराबरी का सलूक करना होगा। शरीयत का हवाला दे कर उनके साथ ग़ैर बराबरी का सलूक करना बंद करना होगा। इस मुद्दे पर बहुत संजीदगी के साथ ग़ौर व फ़िक्र करना होगा, वरना जो हो रहा है देख रहें हैं और जो होगा चुप चाप देखना पड़ेगा। ठेकेदारी का ज़माना अब धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है।